जगन्नाथ पूरी रथ यात्रा: Festival, History, Facts & Myths

Jagannath rath yatra

Jagannath Puri Rath Yatra – जगन्नाथ पूरी रथ यात्रा के विषय में जानने से पहले हम आपको भारत का आध्यात्मिक परिचय देते हैं। ताकि आप ये समझ सकें की त्यौहार ये उत्सव भारत के लिए इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं। क्या सबंध हैं इनका भारत से।

भारत की आत्मा उसका अध्यात्म है। ये वो देश हैं जहाँ पत्थर, पहाड़, पेड़, पशु, नदियाँ सब पूजे जाते हैं। एक बड़ी पुरानी कहावत है “दो कोस पे बदले पानी चार कोस पर वाणी”। हज़ारों भाषाएँ, भाषाओँ से जुड़े प्रांत और प्रांतों से जुडी मान्यताएं और मान्यताओं को मानने वालों की उसके प्रति अटूट श्रद्धा और आस्था। भिन्न भिन्न प्रांतों की इन मान्यताओं और इनसे जुडी आस्था ने मिल कर विराट भारतीय संस्कृति को जन्म दिया है। और यही भारतीय संस्कृति है जिसने सभी प्रांतों को एक सूत्र में बाँध कर साकार रूप में एक राष्ट्र को प्रकट किया है जिसे हम भारत के रूप में जानते हैं।

भारत का अर्थ है जो सदैव आध्यात्मिक प्रकाश में रत रहे अर्थात उस अनंत से जुड़ा रहे, ईश्वर के ज्ञान के प्रकाश में डूबा रहे। और यही ईश्वरीय प्रकाश में डूबा भारत अपने आनन्द को विभिन्न प्रकार के त्योहारों के रूप में प्रकट होता है। जो हर प्रांत, में अलग अलग रूप में मनाये जाते हैं। और यही एक कारण है जो भारत को त्योहारों के घर के रूप में भी जाना जाता है। ऐसा ही एक उत्सव है ओडिसा के पूरी में मनाई जाने वाली, श्री जगन्नाथ पूरी रथ यात्रा। इसका इतिहास सदियों पुराना है। ये वो यात्रा है जिसमें भगवान् श्री जगन्नाथ की दैविक लीलाओं के साथ साथ उनके भक्त उनकी अवतार रूप की मानवीय लीलाओं का भी आनन्द उठाते हैं। आइये जानते हैं श्री जगन्नाथ पूरी के इतिहास को, उससे जुडी मान्यताओं को और उसके महत्त्व को।

When Jagannath Puri Rath Yatra festival is celebrated? जगन्नाथ रथ यात्रा उत्सव कब मनाया जाता है?

भगवान् जगन्नाथ का मंदिर 12वीं शताब्दी में अस्तित्व में आया था। जगन्नाथ पूरी रथ यात्रा एक प्रमुख हिंदू त्योहार है, जो प्रत्येक वर्ष जून – जुलाई के महीने में मनाया जाता है। हालाँकि, त्योहार की उत्पत्ति भारत के उड़ीसा राज्य के पूर्वी तट पर जगन्नाथ पुरी में हुई थी। यह त्योहार भगवान जगन्नाथ या भगवान श्री कृष्ण के साथ जुड़ा हुआ है जो अपने भाई और बहन के साथ अपनी मौसी के यहाँ जाते हैं। पारंपरिक उड़िया कैलेंडर के अनुसार जगन्नाथ रथ यात्रा उत्सव हिन्दू चंद्र माह के आषाढ़ के शुक्ल पक्ष के दूसरे दिन से शुरू होता है।

History of Jagannath Puri Rath Yatra – जगन्नाथ पूरी रथ यात्रा का इतिहास

भगवान श्री कृष्ण भगवान विष्णु के आठवें अवतार हैं और इसलिए उन्हें अक्सर भगवान् जगन्नाथ के रूप में पूजा जाता है। यह नाम संस्कृत के दो शब्दों के जोड़ से बना है – जगत और नाथ। इसलिए, “जगन्नाथ” शब्द का अर्थ है जगत का नाथ और भगवान कृष्ण को संदर्भित करता है, जो ब्रह्मांड के सर्वोच्च ईश्वर और निर्माता के रूप में पूजे जाते है।भगवान् श्री जगन्नाथ को भगवान् श्री कृष्ण का पुनर्जन्म माना जाता है।

ऐसा माना जाता है कि भगवान जगन्नाथ हर वर्ष अपने जन्मस्थान की यात्रा करना चाहते हैं। इस त्योहार के साथ विभिन्न कथाएँ जुड़ी हुई हैं, आइये जानते उनमें से कुछ प्रमुख घटनाओं को या कथाओं को :

Jagannath Puri Rath Yatra

एक बार भगवान् श्री कृष्ण पत्नियों ने माँ रोहिणी से श्री कृष्ण और गोपियों से संबंधित कुछ दिव्य कथाएँ सुनना चाहती थीं। लेकिन माँ कहानी सुनाने को तैयार नहीं थी। लंबे अनुरोध के बाद वह मान गई लेकिन इस शर्त पर कि सुभद्रा दरवाजे की रखवाली करेंगी ताकि कोई भी भीतर प्रवेश न कर सके और उन दिव्य लीलाओं न सुनें । जब रोहिणी माँ द्वारा कहानियाँ सुनाई जा रही हैं, उस वक्त सुभद्रा द्वार की रखवाली कर रही थी की तभी भगवान कृष्ण और बलराम द्वार पर पहुँचे और सुभद्रा ने उन्हें अपने हाथों को फैला कर उनको भीतर प्रवेश करने से रोक दिया। ठीक उसी समय देव ऋषि नारद पहुंचे और उन्होंने तीनों भाई-बहनों को एक साथ देखा और उनसे सदा ऐसे ही दर्शन देने की प्रार्थना की, जिसे तीनों ने स्वीकार कर लिया। और इसलिए, भगवान कृष्ण, सुभद्रा और बलराम पुरी के जगन्नाथ मंदिर में निवास करते हैं।

एक दूसरी कथा ये आती है, जब श्री कृष्ण का द्वारिका में अंतिम संस्कार किया जा रहा था, तो बलराम अतयंत दुखी थे और इसी दुःख में श्री कृष्ण के आंशिक रूप से अंतिम संस्कार हुए शव के साथ खुद को समुद्र में समाधि लेने के लिए निकल पड़े। उनके पीछे पीछे सुभद्रा भी थीं। उसी समय, भारत के पूर्वी तट पर, जगन्नाथ पुरी के राजा इंद्रद्युम्न ने सपना देखा कि भगवान लकड़ी के कुंदे के रूप में पुरी के तैरते हुए आये हैं। और उसे शहर में एक विशाल मूर्ति का निर्माण करना चाहिए और कृष्ण, बलराम और सुभद्रा की लकड़ी की मूर्तियों को पवित्र करके वहाँ स्थापित करना चाहिए।

राजा इंद्रद्युम्न का सपना सच हो गया। राजा ने उस लकड़ी के कुंदे को ले लिया। लेकिन सवाल यह था कि इनकी मूर्तियां कौन बनाएगा। यह माना जाता है कि देवताओं के वास्तुकार, विश्वकर्मा, एक पुराने बढ़ई के रूप में पहुंचे। उन्होंने स्पष्ट किया कि मूर्तियों को तराशते समय किसी को भी उन्हें परेशान नहीं करना चाहिए, और यदि कोई ऐसा करता है, तो वह काम को अधूरा छोड़ कर गायब हो जायेंगे।

कुछ महीने बीत गए। अधीर इन्द्रद्युम्न ने विश्वकर्मा के कमरे का दरवाजा खोला। विश्वकर्मा तुरंत गायब हो गए क्योंकि उन्होंने पहले ही चेतावनी दी थी। अधूरी मूर्तियों के बावजूद, राजा ने उन्हें पवित्र किया और भगवान श्रीकृष्ण की पवित्र प्रतिमा को जगन्नाथ के रूप में मंदिर में स्थापित किया। मूर्तियों को हर 12 साल में बदल दिया जाता है और मूर्तियाँ बनायीं जाती हैं उन्हें भी अधूरा ही रखा जाता है। आखिरी बार वर्ष 2015 में मूर्तियाँ बदली गयी थीं।

एक कथा और कही और सुनी जाती है। कहा जाता है की भगवान् श्री कृष्ण की पावन देह पूर्ण रूप से नहीं जल सकी थी तो उनकी अस्थि के एक टुकड़े को लकड़ी बाँध कर समुद्र में बहा दिया गया था। जिसको हज़ारों वर्षों के बाद सावरा जनजाति के राजा बिस्ववासु ने पूर्वी तट से प्राप्त किया और उसे नीलमाधव के रूप में पूजने लगा। उस मूर्ति को राजा इन्द्रद्युम्न ने अपने बल से प्राप्त करने का प्रयास किया पर वो मूर्ति देवताओं द्वारा अदृश्य कर दी गयी। वो अत्यंत निराश हुआ। और विरह और पश्च्चाताप में जलने लगा। जिसे देख देवताओं ने उसे दिव्य स्वप्न में आदेश दिया कि वो पूरी के पूर्वी तट पर जाए वहाँ पर उसे लकड़ी का कंदु मिलेगा वो उसे ले आये और उसकी मूर्ति बना कर उसकी पूजा करे। किन्तु उसे अपने साथ बिस्ववासु को लेकर जाना होगा, उसके बगैर वो उस लकड़ी के कंदु को उठा न सकेगा।

आज भी सावरा जनजाति के वंशज भगवान् जगन्नाथ के प्रमुख सेवकों में से एक हैं। स्नान पूर्णिमा से लेकर रथ यात्रा तक केवल सावरा जाति के वंशज ही उनकी सेवा करते हैं। ये प्रसंग यह बताता है कि इस महान परम्परा में जाति का कोई भेदभाव नहीं होता।

Jagannath Puri Rath Yatra Procession: How the Tradition is served – जगन्नाथ रथ यात्रा, कैसे निभाई जाती है परम्परा

आइये अब जानते हैं कि कैसे इस परम्परा को निभाया जाता है। कैसे और कब इस यात्रा तैयारी प्रारम्भ होती है और इस यात्रा को पूर्ण किया जाता है। सबसे पहले जानते हैं भगवान् के रथ विषय में।

The Jagannath Puri Rath Yatra Chariots – भगवान् जगन्नाथ की यात्रा के “रथ”

रथ के विषय में बताने से पहले आपको बता दें कि आज भी इसका निर्माण उसी परिवार के वंशज करते हैं जिन्होंने सबसे पहले इस रथ का निर्माण किया था। उनके अलावा और किसी को इसका अधिकार नहीं है।

रथों का निर्माण वैशाख के उज्ज्वल पखवाड़े के तीसरे दिन अक्षय तृतीया से शुरू होता है, जिसमें पूजा अर्चना होती है। इन रथों का निर्माण पुरी के राजा के महल के सामने और पुरी मंदिर के मुख्य कार्यालय के सामने होता है। इस रथ के निर्माण में करीब 4000 लकड़ी के टुकड़ों का प्रयोग होता है, जो कि ओडिशा सरकार द्वारा सरस्वती पूजा यानी बसंत पंचमी पर उपलब्ध करवाया जाता है। नीम के पेड़ों से प्राप्त लकड़ी इस रथ के निर्माण में प्रयोग में लायी जाती है। इसके निर्माण में कुल 42 दिन का समय लगता है।

Jagannath Puri Chariot Details and Specifications – रथों का पूर्ण विवरण और विशेषतायें

सबसे पहले जानते हैं भगवान् जगन्नाथ के रथ के विषय में:

रथ का नाम: नन्दिघोषा
रथ की ऊंचाई: 45 फीट, छह इंच।
पहियों की संख्या और ऊंचाई: 16 पहियों का व्यास छह फीट है।
रथ रंग: पीला और लाल। (भगवान जगन्नाथ भगवान कृष्ण से जुड़े हैं, जिन्हें पीताम्बरा के नाम से भी जाना जाता है)।
घोड़े का रंग: सफेद।
सारथी: दारुका।

भगवान् बलभद्र

रथ का नाम: तलध्वजा – जिसका अर्थ है “अपने झंडे पर ताड़ के पेड़ के साथ”।
रथ की ऊँचाई: 45 फीट।
पहियों की संख्या और ऊँचाई: व्यास में छह फीट छह इंच मापने वाले 14 पहिए।
रथ के रंग: हरे और लाल।
घोड़े का रंग: काला।
सारथी: मताली।

देवी सुभद्रा

रथ का नाम: देबदलाना – जिसका शाब्दिक अर्थ है, “अभिमान का लोप”।
रथ की ऊंचाई: 44 फीट, छह इंच।
पहियों की संख्या और ऊँचाई: 12 पहिए, छह फीट आठ इंच व्यास की माप।
रथ के रंग: काले और लाल। (काला पारंपरिक रूप से महिला ऊर्जा शक्ति और मातृ देवी से जुड़ा हुआ है)।
घोड़े का रंग: लाल।
सारथी: अर्जुन।

भगवान् की इस रथ यात्रा में उनका सुदर्शन चक्र भी स्थापित किया जाता है। पूरी के जगन्नाथ मंदिर में भगवान् शस्त्र सुदर्शन चक्र की तरह ही स्थापित किया गया है।

How the tradition of Jagannath Puri Rath Yatra is Served – कैसे निभाई जात है रथ यात्रा की परम्परा

यह परम्परा प्रारम्भ होती है “स्नान पूर्णिमा” से। ज्येष्ठ माह पूर्णिमा को भगवान् को 108 घड़े पानी नहलाया जाता है। जिसके बाद ये माना जाता है कि भगवान् बीमार पड़ जाते हैं। इसके उपरान्त उनको करीब 15 दिन के लिए एकांत में रखा जाता है जहाँ उनका उपचार किया जाता है। इस पूरे घटनाक्रम को “अंसारा” कहा जाता है। इन 15 दिनों तक कोई भी उनके दर्शन नहीं कर सकता। केवल ब्राह्मण पुजारी “बिद्यापति” और उनकी पत्नी बिस्वबासु की पुत्री “ललिता” के वंशज ही केवल उनकी सेवा करते हैं।

उसके पश्चात भगवान् जगन्नाथ की अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ यात्रा की तैयारी की जाती है। रथ यात्रा के दिन भगवान् जगन्नाथ अपनी मौसी से मिलने गुंडिचा मंदिर जाते हैं।

यात्रा के दिन, पवित्र अनुष्ठान “छेरा पहारा” ओडिशा के शाही उत्तराधिकारी द्वारा किया जाता है। इसका अर्थ यह होता है की शाही उत्तराधिकारी रथ को साफ़ करता है। बाद में, उनके द्वारा रथ को फूलों से सजाया जाता है। जिस मैदान में रथ आगे बढ़ेगा, उसे भी साफ किया जाता है और फिर उस पर चंदन छिड़का जाता है। शाही परिवार के वंशज को भगवान् का प्रथम सेवक माना जाता है। उनका इस तरह से रथ को साफ़ करना यह बताता है कि भगवान् के सामने कोई बड़ा छोटा नहीं होता, सभी एक सामान होते हैं।

उसके बाद भगवान् जगन्नाथ, भगवान् बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान् के सुदर्शन चक्र को तीनों रथों पर स्थापित किया जाता है। विशाल, रंगीन ढंग से सजाए गए रथों को भक्तों की भीड़ द्वारा “बड़ा डंडा” पर खींचा जाता है। यात्रा में एक बड़ी महत्वपूर्ण पर विचित्र परम्परा का भी निर्वाह किया जाता है। भगवान् का रथ उनके एक मुस्लिम भक्त “सालबेग” की मजार पर कुछ समय के लिए रोका जाता है।

सालबेग की भगवान् जगन्नाथ में अटूट श्रद्धा थी। एक बार जब वो भगवान् जगन्नाथ की रथ यात्रा को देखने के लिए वो जब वृन्दावन से वापस आ रहा था तो रास्ते में वो बीमार हो गया। उसको ये चिंता सताने लगी की वो यात्रा में सही समय पर नहीं पहुँच पायेगा पर जब वो पहुँचा तो उसने देखा की भगवान् का रथ लोग खीँचने का प्रयास तो कर रहे हैं पर कोई खींच नहीं पा रहा। किन्तु उसके पहुँचने के बाद रथ चल पड़ा। सालबेग ने भगवान् के लिए बहुत से भजनों की रचना की। ओडिसा में भक्त सालबेग को बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।

उसके बाद रथ यात्रा गुंडिचा पहुँचती है, जहाँ भगवन करीब 9 दिन रहते हैं। उसके बाद देवी लक्ष्मी जिनको भगवान् जगन्नाथ अकेला छोड़ आये थे, भगवान् जगन्नाथ को वापस बुलाने के लिए जाती हैं। इस अवसर को, “हेरा पंचमी” के नाम से जाना जाता है, जिसे मंदिर में काफी धूमधाम से मनाया जाता है।

Jagannath Puri Rath Yatra

उसके बाद भगवान् वापस आते हैं, “जिसे बहुदा यात्रा” कहा जाता है। शाम को जब यात्रा जगन्नाथ मंदिर पहुँचती है तो भगवान् को वहीँ बाहर प्रतीक्षा करनी होती है। अगले दिन, मूर्तियों को बच्चों की तरह नए कपड़े और सोने के आभूषणों से सजाया जाता है और इस अनुष्ठान को “सूना वेसा” कहते हैं। और उसके पश्चात भगवान् की मूर्तियों को रत्न सिंहासन पर स्थापित किया जाता है। इस प्रक्रिया को “निलाद्री बीजे” कहा जाता है। और इस प्रकार भगवान् जगन्नाथ याता पूर्ण होती है।

Significance Jagannath Puri Rath Yatra Significance – भगवान् जगन्नाथ यात्रा का महत्त्व

हर साल, भक्तों द्वारा रथ यात्रा निकाली जाती है। मूर्तियों को रथ पर स्थापित किया जाता है और तीनों रथों को भक्तों द्वारा पुरी की गलियों से कुछ किलोमीटर दूर गुंडिचा मंदिर तक खींचा जाता है। ऐसी धारणा है कि जुलूस के दौरान अपने भगवान के रथों को खींचना भगवान की शुद्ध भक्ति में संलग्न होने का एक तरीका है और यह उन पापों को भी नष्ट कर देता है जो शायद जानबूझकर या अनजाने में किए गए हैं।

जगन्नाथ रथ यात्रा दुनिया भर से लाखों भक्तों द्वारा मनाई जाती है जो भगवान का आशीर्वाद मांगते हैं और अपनी इच्छाओं को पूरा करते हैं। रथ यात्रा के समय का वातावरण इतना शुद्ध और सुंदर होता है। रथ के साथ भक्तों के ढोल पीटने की ध्वनि के साथ गीत, मंत्र गाते रहते हैं। जगन्नाथ रथ यात्रा, गुंडिचा यात्रा, रथ महोत्सव, दशावतार और नवदीन यात्रा के रूप में भी प्रसिद्ध है।

लेकिन एक विशेष बात और योग्य है। चाहे रथ यात्रा का इतिहास हो या भक्त सालबेग की कथा। वो स्पष्ट ये बताती ईश्वर की दृष्टि में भक्त की न तो कोई जाति होती है और न ही कोई विशेष सम्प्रदाय ही महत्त्व रखता है। ये यात्रा समाज में आपसी सौहार्द को स्थापित करती है।

रथ यात्रा में प्रयोग लकड़ी को मंदिर चूल्हें में प्रयोग करता है। मंदिर की रसोई में 56 भोग पकाये जाते हैं।

आइये चलते चलते जगन्नाथ पूरी मंदिर से जुड़े कुछ रोचक तथ्यों को भी जान लेते हैं।

जानिए क्यों भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के हाथ, पैर और कान नहीं हैं!

इतने लंबे समय से सुनी गई कहानियों के अनुसार, कवि तुलसीदास ने एक बार भगवान राम की तलाश में पुरी का दौरा किया था, जिन्हें वे रघुनाथ कहते थे। भगवान जगन्नाथ के दर्शन पूरा करने के बाद, वे बेहद निराश थे। वह इतना दुखी हुए की वो वहाँ से चले गए।

तब तुलसीदास मालतीपथपुर नामक गाँव में पहुँचे। वहाँ वह एक पेड़ के नीचे बैठ कर रोने लगे। पास से गुजर रहा एक लड़का उसके पास आया और उनसे उनकी तड़प का कारण पूछा। कवि ने लड़के को समझाया कि उनके रघुनाथ ने में छोड़ दिया था और वह मंदिर में जो कुछ भी देखता था, उसमें वह अस्तित्वहीन दिखते थे।

तब लड़के ने तुलसीदास को समझाया कि रघुनाथ परम ब्रम्हा के अवतार हैं, जो बिना पैरों के चल सकते हैं, बिना आंखों के देख सकते हैं और बिना कानों के सुन सकते हैं। तब तुलसीदास को अपनी मूर्खता का एहसास हुआ और रघुनाथ को खोजने के लिए वापस पुरी पहुंचे।

इससे पता चलता है कि जगन्नाथ के कान नहीं, हाथ नहीं और पैर नहीं हैं।

इससे जुड़ा एक और वृत्तांत भी आता है कि पहले वहाँ पर भगवान् की चतुर्भुज रूप की मूर्ति स्थापित थी पर 16वीं सदी में आक्रांताओं द्वारा मंदिर पर लगातार हमला किया गया। तो उस वक्त के पूरी के राजा ने ये निर्णय लिया की ऐसी मूर्ति स्थापित की जाए जिसको बनाना आसान हो। ये मूर्ति जनजाति कला का सुन्दर नमूना प्रतीत होता है। हो सकता है ये वहीँ से प्रेरित हो।

पुरी के जगन्नाथ मंदिर के ऊपर पक्षी और विमान क्यों नहीं उड़ते ?

मंदिर अधिकारियों ने 2014 में, नागरिक उड्डयन महानिदेशालय को धार्मिक और सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए ये अपील की थी की मंदिर किसी भी तरह के विमान को नहीं उड़ने दिया जाए। किन्तु DGCA ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। ये बिल्कल स्पष्ट है कि जगन्नाथ मंदिर “NO FLY ZONE” नहीं है।

रही बात मंदिर के ऊपर से कोई पक्षी न उड़ पाने की बात तो, मंदिर इतना ऊँचा है कि कोई साधारण पक्षी उसके ऊपर से उड़ ही नहीं सकता। लेकिन ये माना जाता है कि कोई पक्षी उसके ऊपर से नहीं उड़ता।

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Jagannath Puri rath yatra और Jagannath Temple से जुड़ी कुछ और रोचक और आश्चर्यजनक जानकारी

1 मंदिर के ऊपर लगा ध्वज हवा के बिलकुल विपरीत दिशा में लहराता है।

Jagannath Puri Rath Yatra
From the wall of Odhisa news Insight

2 पूरी में आप कहीं से भी, किसी भी जगह से मंदिर के ऊपर स्थापित चक्र को देखें वो आपको हमेशा अपने तरफ मुख किये ही दिखेगा।

3 मुख्य गुंबद की छाया दिन के किसी भी समय देखें वो आपको अदृश्य ही दिखाई देगी।

4 जो प्रसाद मंदिर की रसोई में पकाया जाता है, वो हमेशा एक ही मात्रा में पकता है आज तक कभी भी कम या अधिक नहीं पड़ा। मंदिर की रसोई में से एक बार में 1 लाख लोगों का भोजन पक जाता है।

5 मंदिर में जिन सात बर्तनों में भोजन पकाया जाता है, उनको एक के ऊपर एक करके लकड़ी के चूल्हे पर रखा जाता है। फिर भी जो बर्तन सबसे ऊपर होता है उसका भोजन सबसे पहले पकता है।

6 जगन्नाथ मंदिर में चार दरवाजे हैं, और सिंघाधाम मंदिर के प्रवेश का मुख्य द्वार है। जब आप सिंधुद्वारम के माध्यम से प्रवेश करते हैं, तो आप स्पष्ट रूप से समुद्री लहरों की आवाज़ सुन सकते हैं, लेकिन एक बार जब आप सिंघाधाम जाते हैं, तो बस एक मोड़ लें और उसी दिशा में वापस चलें, आप अब लहरों की आवाज़ नहीं सुनेंगे। वास्तव में, जब तक आप मंदिर के अंदर हैं, तब तक आपको लहरों की आवाज़ नहीं सुनाई देगी।

7 दुनिया के किसी भी हिस्से में, आपने देखा होगा कि दिन के समय, समुद्र से हवा जमीन पर आती है, जबकि भूमि से हवा शाम को समुद्र की ओर बढ़ती है। लेकिन जगन्नाथ पूरी में, भौगोलिक कानून भी उलट हैं। यहाँ, इसका विपरीत होता है।

हमने अपनी तरफ से पूरा प्रयास किया है कि आपतक हम Jagannath Puri Rath Yatra से जुडी सारी जानकारी दे सकें। अगर आपको हमारे इस लेख में कोई त्रुटि लगे या कोई तथ्यात्मक गलती लगे तो आप comment के माध्यम से जरूर सूचित करें। हम अपनी गलती को अवश्य सुधारेंगे। अगर आपका कोई सुझाव हो तो वो भी जरूर हमसे साँझा करें।

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