Kabir das Biography in Hindi, Kabir das ke dohe, bhajan, Images

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Kabir das Biography in Hindi या कहें की कबीर दास जी की जीवनी लिखने से पूर्व मैं एक बात कहना चाहूँगा। संत कबीर के व्यक्तित्व, जीवन, ज्ञान उनके शब्दों को मैं किसी एक लेख में लिख सकूँ ऐसा सामर्थ्य मुझमें नहीं है। वो भक्तिकाल उन महानायकों में से एक थे, जिन्होंने अन्धविश्वास, जातिवाद, व्यर्थ कर्मकाण्ड, पाखण्ड, साम्प्रदायिक रूढ़िवादिता के विरुद्ध आध्यात्मिक क्रांति का बिगुल फूँका था। जो ज्ञान उन्होंने पंद्रहवीं शताब्दी में दिया वो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जैसा की तब था। उनका एक एक शब्द अनमोल है या यूँ कहें की अपने आप में एक ग्रन्थ है ऐसे में उनके सम्पूर्ण जीवन के कार्यों या उनकी रचनाओं पर कोई एक लेख लिख कर समझाया जा सके ऐसा कर पाना संभव नहीं है। कबीर दास जी का एक दोहा है :

सब धरती कागज करूँ, लिखनी सब बनराय।
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाय॥

अर्थात अगर सारी धरती को कागज़ में परिवर्तित कर दिया जाए और सारे संसार में जितने वन हैं उसकी सारी लकड़ी से कलम बना दिया जाए, सातों समुद्रों को स्याही के रूप में प्रयोग किया जाए तब भी गुरु गुण लिखा नहीं जा सकता है।

कबीर दास जी का ये दोहा स्वयं कबीर दास जी पर कितना सटीक बैठता है। कबीर स्वयं पूर्ण गुरु या सतगुरु थे और पूर्ण गुरु के गुणों के विषय में लिखने का सामर्थ्य भला किस में हो सकता है।

गुरु को जो नर जानते ते नर कहिये अंध,

दुखिये इस संसार में आगे यम फंद।।

जो गुरु को नर या मनुष्य समझते हैं उनको कबीर अंधे के सामान कहते हैं और आगे लिखते हैं कि वो न सिर्फ इस लोक में दुःख अपितु आगे वो जन्म मरण के चक्रव्यूह में फँसता है।

अब तो आप समझ ही गए होंगे की कबीर दास जी के विषय में लिखने का अर्थ है स्वयं ब्रह्म के विषय में लिखना तो आप स्वयं विचार कीजिये की क्या कोई भी लेखक किसी एक लेख में कबीर दास जी को समेट सकता है ? इसलिए अगर इस महान संत के विषय में कोई त्रुटि रह जाए तो पाठकों ज्ञानियों से क्षमाप्रार्थी हूँ।

Kabir das Biography in Hindi – कबीर दास जी की जीवनी
नाम (Name)संत कबीरदास (Kabir Das)
जन्म (Birthday)1440, लहरतारा ताल, काशी
पिता का नाम (Father Name)नीरू
माता का नाम (Mother Name)नीमा
गुरु का नाम (Spiritual Master)संत रामानंद
पत्नी का नाम (Wife Name)लोई
बच्चें (Childrens)कमाल (पुत्र), कमाली (पुत्री)
मुख्य रचनाएं (Kabir das Poems)साखी, सबद, रमैनी
शिक्षा (Education)निरक्षर
मृत्यु (Death)1518, मगहर, उत्तर प्रदेश
Kabir das Biography in Hindi – कबीर दास जी का जीवन परिचय हिन्दी में

आइये सबसे पहले जानते हैं इस महान संत के जन्म के विषय में। संत कबीर दास जी के जन्म के विषय में कुछ भी ठीक से इतिहासकारों को ज्ञात नहीं है। उनके जन्म स्थान, जन्मतिथि, उनके जन्म के कारक उनके माता पिता का भी सही ज्ञान किसी के पास नहीं है। फिर जो कुछ भी अबतक माना जाता रहा है वो हम आपके सामने रख रहे हैं। माना जाता है कि उनका जन्म 1440 में लहरतारा ताल, काशी में हुआ था। कहा जाता है कि उनकी जन्मदात्री माता एक गरीब ब्राह्मण की सुपुत्री थी किन्तु वह विधवा थी, पर अनजाने में संत रामानन्द के आशीर्वाद से उनको पुत्र रत्न की प्राप्ति थी। किन्तु समाज के भय से उन्होंने उनको त्याग दिया था।

वहीं अगर कबीर पन्थियों की माने तो कबीर दास, काशी में लहरतारा तालाब में एक कमल के फूल के ऊपर उत्पन्न हुए थे। उनके जन्म को लेकर जो भी किवंदती हो पर लगभग सभी इतिहासकार इस बात से सहमत हैं कि उनका पालन पोषण करने वाले माता पिता का नाम नीमा और नीरू था, जो कि मुस्लिम जुलाहे थे। उनकी स्वयं की कोई औलाद नहीं थी। उन्होंने कबीर को बिलकुल अपने सगे पुत्र की ही तरह पाला। कबीर दास जी ने अपने माता पिता से जुलाहे के काम को सीखा और आजीवन इसी कार्य से अपनी जीविका चलाते रहे।

“जाति जुलाहा नाम कबीरा बनि बनि फिरो उदासी।’

Kabir das Education and Spiritual Awakening in Hindi कबीर दास जी की शिक्षा दीक्षा – Kabir das Biography in Hindi

कबीर दास जी पढ़े लिखे नहीं थे किन्तु आज उनके कार्यों और उनकी रचनाओं पर लोग पीएचडी करते हैं।

मासी कागद छूयो नही, कलम गहि नहीं हाथ।

अर्थात मैंने स्याही और कागज को नहीं छुआ, कलम को कभी हाथ में नहीं पकड़ा।

उनके आध्यात्मिक गुरु का नाम संत श्री रामानंद था। वो भले ही उनका पालन पोषण एक मुस्लिम घर में हुआ था पर उनकी आध्यात्मिक पिपासा उन्हें संत रामानन्द के पास ले गयी।

गुरु की महिमा के विषय में और विस्तार से जानने के लिए पढ़ें Guru Purnima in Hindi, Guru Purnima quotes, Guru Purnima Images

उनके संत रामानन्द जी को अपना गुरु बनाने के पीछे एक कथा आती है जो की आपने कई जगह अवश्य पढ़ी होगी। एक बार कबीरदास पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर लेट गए, उसी समय स्वामी रामानंद जी गंगा स्नान करने के लिए सीढ़ियों से उतर रहे थे तभी उनका पैर जाकर कबीर दास जी के शरीर पर पड़ा रामानन्द जी के मुँह से ‘राम-राम’ शब्द निकल गया । फिर क्या था उसी राम को कबीर दास जी ने अपना दीक्षा मंत्र मान लिया और रामानन्द जी को अपना गुरु स्वीकार कर लिया।

किन्तु बहुत से इतिहासकार भी हैं जो इस कहानी को सत्य नहीं मानते और मैं भी इस कथा से सहमत नहीं हूँ।

हम कासी में प्रकट भये हैं, रामानन्द चेताये।

इस दोहे में वो कह रहे हैं कि उनके गुरु ने उनको चेताया या कहें की जागृत किया। कबीर दास जी जिनके दोहे गुरु की महिमा का जो वर्णन करते हैं ये कहानी उससे कदापि मेल नहीं खाती। कबीर दास जी ने अपना पूरा जीवन आडम्बर और पाखंड के विरुद्ध लड़ा इसलिए उन्होंने उस वक्त पाखंडी गुरुओं और तांत्रिकों के जाल में कोई न फँसे इसके लिए अपने असंख्य वाणियों में उन्होंने पूर्ण गुरु की पहचान बताई। और ये भी बताया की वो पूर्ण गुरु कौन सा ज्ञान देता है। कबीर दास जी कहते हैं की पूर्ण गुरु वही है जो ईश्वर का साक्षात्कार करा दे, जो इधर उधर की बात न करे अपितु तुरंत ईश्वर को घट में ही प्रकट कर दे। आइये हम इस दोहें के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं।

जगमग जोति गगन में झलकै, झीनी राग सुनावै।

मधुर मधुर अनहद धुन बाजै, अमृत की झर लावै ।।

जगत में बहुत गुरु कनफूका, फाँसी लाये बुझावै ।

कहै कबीर सोई गुरु पूरा, जो कथनी आन मिलावै ।।

अर्थात आंतरिक गगन में ईश्वर की अखंड ज्योति निरंतर जगमगा रही है। सच्चे नाम की झीनी झीनी रागिनी श्वांसों में चल रही है। हर पल हर क्षण भीतर मधुर अनहद नाद ध्वनित हो रहा है। यह लगातार बिना किसी के बजाये, स्वतः बज रहा है। भीतर के गगन मंडल से अमृत – रस निर्झर झरता रहता है। पर जरा गौर करें अंतिम पंक्तियों पर। इनमें कबीर दास जी बड़े ही पते की बात कहते हैं की आज समाज में बहुतेरे ऐसे गुरु हैं, जो दीक्षा के समय कान में कोई मन्त्र फूंक देते हैं और इसे ही पूर्ण ज्ञान कहकर जगत को भरमाते हैं। पर पूर्ण गुरु वही है, जो जिज्ञासु को न केवल इन अनुभूतियों के विषय में बताये, बल्कि उसके भीतर इन्हें प्रकट भी कर दिखाए।

अब आप खुद ही सोचिये की कबीर अपने दोहें में कितना स्पष्ट कह रहें हैं की गुरु कैसा होना चाहिए और वो जब शिष्य को दीक्षा देता है तो उसके भीतर ही ईश्वर को प्रकट कर देता है। जब कबीर गुरु धारण करने के ऐसे मापदंड रख रहे हैं वो, क्या रामानन्द जी को ऐसे ही गुरु बना लेंगे। रामानन्द जी ने उनको जब ब्रह्मज्ञान दिया तब उनको भी साक्षात ईश्वर दर्शन कराये। और इसलिए वो अपने दोहे में गुरु की महिमा गाते हुए कहते हैं

गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय।।

गुरू और गोबिंद (भगवान) एक साथ खड़े हों तो किसे प्रणाम करना चाहिए – गुरू को अथवा गोबिन्द को? ऐसी स्थिति में गुरू के श्रीचरणों में शीश झुकाना उत्तम है जिनके कृपा रूपी प्रसाद से गोविन्द का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

यह दो दोहे इस बात को स्पष्ट करते हैं की उनको ज्ञान के रूप में साक्षात ईश्वर के दर्शन कराये थे संत रामानंद जी ने इसलिए उन्होंने गुरु की ऐसी महिमा गायी। अगर उनको ऐसे ही राम नाम चाहिए होता तो वो किसी से भी ले लेते पर उनको वो शाश्वत ज्ञान चाहिए था जो उन्हें श्री रामानन्द जी ने प्रदान किया। और इसी ज्ञान की तलवार से उन्होंने उस वक्त फैले पाखंड और ढोंग के विरुद्ध युद्ध लड़ा।

उन्होंने कभी खुद को किसी पंथ या सम्प्रदाय से नहीं जोड़ा न मंदिर मस्जिद से जोड़ा। पर ये भी एक विचित्र बात है कि उनको मानने वालों ने जरूर खुद का एक पंथ बना लिया है, जो संत मत या कबीर पंथी भी कहलाते हैं।

कबीर दास जी का वैवाहिक जीवन Kabir das Biography in Hindi

काशी के बाज़ारों के बीच कबीर चौरा मोहल्ले में कबीर मठ स्थापित है। कबीर दास के माता पिता नीरू नीमा ने जिस घर में रहते हुए कबीर दास जी का पालन पोषण किया वही घर बाद में कबीर मठ के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जो आज भी वहीँ पर स्थित है। इसी कबीर मठ में कबीर दास जी का अधिकतर जीवन बिता। कहा जाता है की कबीर दास जी विवाहित थे। कबीरदास जी का विवाह वनखेड़ी बैरागी की कन्या ”लोई” के साथ हुआ था। उनकी दो संतान थी पुत्र कमाल और पुत्री कमाली।

कबीर दास जी ने उस काल में इस सत्य को प्रतिपादित किया की ईश्वर को पाने के सन्यास लेकर जंगल जाने की आवश्यकता नहीं है। वो ईश्वर प्राप्ति या भक्ति के लिए प्रतीकों के प्रयोग के विरुद्ध थे। उनका स्पष्ट कहना था की ईश्वर की प्राप्ति कहीं से भी संभव है बस जीवन में कोई पूर्ण गुरु होना चाहिए। उन्होंने जो शिक्षा मानव समाज को दी वही स्वयं जी कर भी दिखाया। उन्होंने न सिर्फ एक साधारण गृहस्थ की तरह जीवन जीते हुए ईश्वर को पाया अपितु स्वयं को ही ईश्वर के रूप में स्थापित कर दिया।

सिद्धपीठ कबीर चौराहा मठ मूलगादी और उसकी परम्परा Kabir das Biography in Hindi

कबीरचौरा मठ, संत कबीर के कार्य स्थल के रूप में प्रसिद्ध है, उनका बचपन, परवरिश और उनसे जुड़ी चीजें यहाँ संरक्षित हैं। कबीर के जीवन की घटनाओं से संबंधित नीरू-नीमा टीला, समाधि मंदिर, बीजक मंदिर, पुस्तकालय और मूर्तियों को देखने के लिए बहुत सारी चीजें हैं। कबीरपंथ का केंद्र बिंदु कबीरचौरा मठ है। यह सभी कबीरपंथी जीवन में एक बार अवश्य यहाँ जाते हैं। देश विदेश के विद्वानों के लिए ये स्थान भक्ति काल की विरासत पर शास्त्रार्थ करने के लिए भी बहुत प्रसिद्ध है। कबीर मठ वह इमारत है जो एक विशाल क्षेत्र में विकसित हुई थी जो कभी कबीर दास जी द्वारा उपयोग की गयी थी। कहा जाता है कि यह संत कबीर का प्राकट्य धाम है जहां वे उभरे थे।

कबीर मठ मूल रूप से एक इमारत है जो कई छोटी इमारतों से भरी है। स्थापत्य की तुलना में इसकी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक प्रासंगिकता अधिक है। इसमें लेहरतारा ताल, कबीर की झोपड़ी, चबुतरा, समाधि मंदिर, बीजक मंदिर, खडाऊ और बहुत कुछ है।

साहित्य, धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में भारत के लिए कबीर का महान योगदान है। हालाँकि स्वयं अनपढ़ कबीर हमेशा पढ़ाते थे और उनकी शिक्षाएँ आज भी दुनिया को मानवता का पाठ पढ़ाती हैं। उनके विचार सांप्रदायिक सद्भाव के आधार प्रदाता के रूप में प्रासंगिक हैं। कबीर अभी भी मानवता, विश्वसनीयता और विनम्रता के अपने महान सबक के साथ जीवित हैं। उन्होंने धार्मिक कट्टरता और हठधर्मिता का उपहास किया। कबीर ने भारत को एकजुट करने में एक महान भूमिका निभाई और वह सदा भारतीयों को तार्किक, मानवीय और उचित बनने के लिए प्रेरित करते रहेंगे।

कबीर दास हिन्दू थे या मुसलमान ? Kabir das Biography in Hindi

कबीर दास की मृत्यु के पश्चात भी ये विवाद खत्म नहीं हुआ। जब उनकी मृत्यु हुई उस वक्त उनके अंतिम संस्कार को लेकर विवाद हुआ की वो राम के उपासक इसलिए उनका संस्कार हिन्दू रीति से होना चाहिए। वहीँ मुसलमान ये कहने लगे की वो मुसलमान थे इसलिए उनको अंतिम संस्कार इस्लामिक रीति से होना चाहिए।

ये भी बड़ी विचित्र विडंबना है कि जिस साम्प्रदायिक वाद विवाद का वो सदा विरोध करते रहे, उनकी मृत्यु के बाद फिर से वो शुरू हो गया। उनकी शिक्षाओं को पल भर में भुला दिया गया। अगर कबीर को हिन्दू कहें तो उनका ये दोहा इस तथ्य को नकारता प्रतीत होता है। ये दोहा हिन्दुओं के मूर्ति पूजा की परम्परा पर कुठाराघात करता प्रतीत होता है।

पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहार।
ताते ये चाकी भली, पीस खाय संसार॥

इसका अर्थ ये हुआ कि अगर पत्थर पूजने से ईश्वर मिलते हैं तो मैं पहाड़ को पूजूँगा। वो आगे कहते हैं की उससे तो ये पत्थर की चक्की भली है जो कम से कम अनाज पीस रही है जिसकी वजह से संसार का पेट भर रहा है।

वहीं अगर ये कहें की वो मुसलमान थे, तो ये दोहा उनकी मान्यताओं पर प्रश्न खड़ा करता है।

कंकर-पत्थर जोरि के  मस्जिद लई बनाय।

ता चढ़ि मुल्ला बांग दे का बहरा भया खुदाय

इसका अर्थ यह हुआ की पत्थर को जोड़ कर मस्जिद बना ली और अब उसपर चढ़ कर मुल्ला मुर्गे के जैसे बाँग दे रहा है जैसे खुदा बहरा है या ऊँचा सुनता है।

अगर कबीर न हिन्दू थे और न मुसलमान तो फिर वो कौन थे ?

यह जानने के लिए हमें कबीर दास जी के दर्शन को समझना होगा। वहीँ से इसका भेद खुलेगा।

Philosophy of Kabir Das – कबीर दास का दर्शन Kabir das Biography in Hindi

कबीर दास का दर्शन किसी सम्प्रदाय की परिधि में नहीं आता। उनके दोहों, चौपाइयों, भजनों को अगर पढ़े तो पाएंगे की उनका मूल उद्देश्य प्रत्येक मनुष्य को ईश्वर से जोड़ना था। जैसे ही हम कबीर को किसी पंथ या सम्प्रदाय की सीमा में बाँधने का प्रयास करते हैं उसी वक्त हम उनके द्वारा दी गयी सभी शिक्षाओं का अनादर कर देते हैं जिसके लिए उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन लगा दिया।

कबीर दास जी का स्पष्ट कहना था कि लोग कर्मकांड, पाखंड, धर्मान्धता में इसलिए फँसे हुए हैं क्यूंकि वो धर्म का सही अर्थ जानते ही नहीं हैं। उनका कहना था कि धर्म को अगर मनुष्य के अंदर प्रकट कर दिया जाए तो धर्म के नाम पर होने वाला ये युद्ध अपने आप समाप्त हो जायेगा।

हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना,
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना

भावार्थ: हिन्दुओं के लिए राम प्यारा है और मुस्लिमों के लिए अल्लाह रहमान प्यारा है। दोनों राम रहीम के चक्कर में आपस में लड़ मिटते हैं लेकिन कोई सत्य को नहीं जान पाया।

वो व्यवहारिक अध्यात्म या practical spirituality की बात करते थे। जिसमें ईश्वर को सिर्फ माना नहीं जाता था अपितु देखा जाता है।

सुना सुनी की बात नहीं देखा देखी की बात

दूल्हा दुल्हिन मिल गए, फीकी परी बरात

वो कहा करते थे की ईश्वर कोई सुना सुनी का विषय नहीं है उसको देखा जाता है। बिना ईश्वर साक्षात्कार किये भक्ति का कोई अर्थ नहीं। और ये कोई अकेले उनका मत नहीं था जो वो लेकर आये थे। ये वो सत्य है जो सृष्टि के प्रारम्भ से है। और इसी परम्परा को वो आगे लेकर चले। उन्होंने समय काल परिस्थति के अनुरूप अपनी शिक्षाओं या कहें की शब्दों को ढाल कर इसी सत्य का प्रचार किया। क्यूंकि वो ये जानते थे की पाखंड और आडम्बर का चक्रव्यूह को भेदने का यही एक उपाय है की प्रत्येक मनुष्य को उस सत्य से जोड़ दो।

ज्यों नैनन में पुतली, त्यों मालिक घर माँहि।
मूरख लोग न जानिए , बाहर ढूँढत जाहिं

भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जैसे आँख के अंदर पुतली है, ठीक वैसे ही ईश्वर हमारे अंदर बसा है। मूर्ख लोग नहीं जानते और बाहर ही ईश्वर को तलाशते रहते हैं।

ज्यों तिल माहि तेल है, ज्यों चकमक में आग ।
तेरा साईं तुझ ही में है, जाग सके तो जाग ।

भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं जैसे तिल के अंदर तेल होता है, और आग के अंदर रौशनी होती है ठीक वैसे ही हमारा ईश्वर हमारे अंदर ही विद्धमान है, अगर ढूंढ सको तो ढूढ लो।

कागत लिखै सो कागदी, को व्यहाारि जीव
आतम द्रिष्टि कहां लिखै, जित देखो तित पीव।

कागज में लिखा शास्त्रों की बात महज दस्तावेज है। वह जीव का व्यवहारिक अनुभव नही है।
आत्म दृष्टि से प्राप्त व्यक्तिगत अनुभव कहीं लिखा नहीं रहता है। हम तो जहाॅ भी देखते है अपने प्यारे परमात्मा को ही पाते हैं।

ज्ञानी भुलै ज्ञान कथि निकट रहा निज रुप
बाहिर खोजय बापुरै, भीतर वस्तु अनूप।

तथाकथित ज्ञानी अपना ज्ञान बघारता है जबकी प्रभु अपने स्वरुप में उसके अत्यंत निकट हीं रहते है।
वह प्रभु को बाहर खोजता है जबकी वह अनुपम आकर्षक प्रभु हृदय के विराजमान है।

अंधो का हाथी सही, हाथ टटोल-टटोल
आंखो से नहीं देखिया, ताते विन-विन बोल।

वस्तुतः यह अंधों का हाथी है जो अंधेरे में अपने हाथों से टटोल कर उसे देख रहा है । वह अपने आॅखों से उसे नहीं देख रहा है
और उसके बारे में अलग अलग बातें कह रहा है । अज्ञानी लोग ईश्वर का सम्पुर्ण वर्णन करने में सझम नहीं है ।

ये सभी कबीर दास जी की वाणी है जो उनके दर्शन को स्पष्ट करती है। उनकी वाणी को अगर पढ़ा जाए तो अपने आप इस प्रश्न का उत्तर मिल जाता है कि वो किसी धर्म या अनुयायी नहीं थे और न ही वो किसी से प्रभावित थे। उन्होंने उसी ज्ञान का प्रचार अपनी सरल भाषा में किया जिसको खिचड़ी भाषा भी कहते हैं। और इसी ज्ञान का प्रचार भक्तिकाल के सभी संत जैसे गुरु नानक, संत रविदास, मीरा बाई, नामदेव आदि कर रहे थे। बुल्लेशाह कहते थे

युगों युगों तू बदले चोले हर नए रूप में तू समझावे

पर हम तेरा रूप न जाने नए नए धर्म बनावें

यही कबीर दास जी के साथ भी हुआ। वो गए हमने उसको समझने की बजाये उनका धर्म जानने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई। और तो और उनके जाने के बाद उनके अनुयायी उन्हीं के जैसे पूर्ण गुरु की खोज करते जैसा वो बता गए थे और उसी ज्ञान को प्राप्त करते उन्होंने उल्टा अपना एक नया पंथ बना लिया कबीर के नाम से ही। जबकि कबीर बहुत सरल शब्दों में समझा के गए की गुरु कैसा होना चाहिए पर हमने उनकी सुनी नहीं और आज देख लीजिये कितने पाखंडी पकडे जा रहे हैं जो धर्म के नाम पर लोगों की श्रद्धा को ठग रहे हैं। क्या कबीर ने इसी पाखंड काण्ड के विरुद्ध युद्ध नहीं छेड़ा था। अगर आज भी गुरु को धारण करने से पहले कोई उनके इन दोहों को समझ ले तो कोई पाखंडी किसी की श्रद्धा को ठग नहीं सकता।

गगन मंडल बिच अमृत कुआं, तहाँ ब्रह्म का वासा।
सगुरा हो सो भर – भर पीवे, निगुरा मरत पियासा।।

अर्थात हमारे मस्तिष्क में अमृत का कुआँ है जहाँ पर ब्रह्म निवास करते हैं पर सिर्फ एक पूर्ण गुरु की कृपा से ही उस अमृत को पिया जा सकता है।

वस्तु कही ढूंढे कही..
कही विधि आये हाथ..?
कहे कबीर वस्तु तब पाईये..
भेदी लीजे साथ..!!

अर्थात ईश्वर को बाहर नहीं अपने अंतर्घट में जानना होगा और इसके लिए किसी भेदी यानी पूर्ण गुरु की शरणागत होना होगा।

भेदी लीन्हा साथ कर..
वास्तु दई लखाय..!
कोटि जनम का पंथ था..
पल में पहुंचा जाय..!!

और वो पूर्ण गुरु को घट के भीतर तुरंत दिखा देता है और करोड़ों जन्मों की यात्रा पल में पूरी हो जाती है।

ऐसे अनेकानेक उनकी वाणी है जो पूर्ण ज्ञान और पूर्ण गुरु की पहचान बताती है और अगर आज भी अगर अनुसरण करे तो कभी किसी पाखंडी के हाथों ठगा न जाए। और यही उनका दर्शन है यही Philosophy of Kabir Das है।

Kabir das Jayanti (Kabir das Biography in Hindi) – कबीर दास जी की जयंती

ऐसा माना जाता है कि महान क्रन्तिकारी संत कबीर दास जी का जन्म ज्येष्ठ के महीने में पूर्णिमा या पूर्णिमा के दिन 1440 में हुआ था। इसीलिए संत कबीर दास जयंती या जन्मदिन हर साल मई या जून में पड़ने वाले ज्येष्ठ के हिंदी महीने की पूर्णिमा पर उनके अनुयायियों और प्रेमियों द्वारा बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।

कबीर दास जी की मृत्यु – Kabir das Biography in Hindi

15 वीं शताब्दी के क्रांतिकारी संत कबीर दास, यह माना जाता है कि उन्होंने अपनी मृत्यु की जगह मगहर को चुना था, जो लखनऊ से लगभग 240 किमी दूर स्थित है। उन्होंने लोगों के दिमाग से परियों की कहानी (मिथक) को हटाने के लिए इस स्थान को मरने के लिए चुना है। उन दिनों, यह माना जाता था कि जो मगहर के क्षेत्र में मरता है, उसे स्वर्ग में कभी जगह नहीं मिलेगी और अगले जन्म में गधे का जन्म होगा।

लोगों के मिथकों और अंधविश्वासों को तोड़ने के लिए ही काशी के बजाय मगहर में कबीर दास की मृत्यु हुई। विक्रम संवत 1575 में हिंदू कैलेंडर के अनुसार, उन्होंने माघ शुक्ल एकादशी पर वर्ष 1518 में जनाधिकार के महीने में मगहर में दुनिया छोड़ दी। यह भी माना जाता है कि काशी में मरने वाले लोग सीधे स्वर्ग जाते हैं और यही कारण है कि हिंदू लोग अपने अंतिम समय में काशी जाते हैं और मोक्ष प्राप्त करने के लिए मृत्यु की प्रतीक्षा करते हैं। इसी मिथक को ध्वस्त करने के लिए कबीर दास काशी के बाहर गए। इससे संबंधित उनकी एक प्रसिद्ध कहावत है “जो कबीरा काशी मुए, रामे कौन निहोरा” अगर काशी में सिर्फ मरने से स्वर्ग जाने का एक सरल तरीका है तो भगवान की पूजा करने की क्या आवश्यकता है।

उन्होंने न सिर्फ अपना जीवन पाखंड, कर्मकांड, धर्मान्धता के विरुद्ध लड़ने में व्यतीत किया अपितु अपनी मृत्यु का भी प्रयोग उन्होंने इसी पाखंड और कोरी मान्यताओं को ध्वस्त करने के लिए किया। उनका न सिर्फ जीवन अपितु मृत्यु भी मनुष्य को सही मार्ग दिखा गयी।

Kabir das Images – Kabir das Biography in Hindi
कबीर दास जी के कार्य – Works of Kabir Das

कबीर दास द्वारा लिखित पुस्तकें आमतौर पर दोहा और गीतों का संग्रह हैं। कुल कार्य बहत्तर के करीब हैं जिनमें से कुछ महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध कार्य हैं – रेख्ता, कबीर बीजक, सुखनिधान, मंगल, वसंत, सबदा, सखियाँ और पवित्र अगम।

वो अपनी रचनाओं में जिस भाषा का प्रयोग करते थे वो सरल तो थी पर वो कई भारतीय भाषाओँ का मिश्रण थी। यह भाषा पंजाबी, राजस्थानी, खड़ी बोली, अवधी, पूरबी, ब्रजभाषा समेत कई भाषाओं की खिचड़ी है।

Kabir das ke Bhajan – कबीर दास के भजन

भजन संख्या 1

मोको कहाँ ढूंढें बन्दे,
मैं तो तेरे पास में ।

ना तीरथ में ना मूरत में, ना एकांत निवास में ।
ना मंदिर में, ना मस्जिद में, ना काबे कैलाश में ॥

ना मैं जप में, ना मैं तप में, ना मैं व्रत उपास में ।
ना मैं क्रिया क्रम में रहता, ना ही योग संन्यास में ॥

नहीं प्राण में नहीं पिंड में, ना ब्रह्माण्ड आकाश में ।
ना मैं त्रिकुटी भवर में, सब स्वांसो के स्वास में ॥

खोजी होए तुरत मिल जाऊं एक पल की ही तलाश में ।
कहे कबीर सुनो भाई साधो, मैं तो हूँ विशवास में ॥

भजन संख्या 2

क्या तन मांजता रे एक दिन माटी में मिल जाना
पवन चले उड़ जाना रे पगले…हो
पवन चले उड़ जाना रे पगले समय चूक पछताना
समय चूक पछताना
क्या तन मांजता रे एक दिन माटी में मिल जाना

चार जना मिल गढ़ी बनाई चढ़ा काठ की डोली
चारो तरफ से आग लगा दी फूंक देइ रे जैसे होरी
हाँ फूंक देइ रे जैसे होरी
क्या तन मांजता रे एक दिन माटी में मिल जाना

हाड़ जले जैसे वन की लकड़ियां केश जले जैसे घासा
कंचन जैसी काया जल गई… हो
कंचन जैसी काया जल गई कोई न आये पासा
क्या तन मांजता रे एक दिन माटी में मिल जाना

तीन दिना तेरी त्रिया रोये, तेरह दिना तेरा भाई
जन्म जन्म तेरी माता रोये…
जन्म जन्म तेरी माता रे रोये करके आस पराई
हाँ करके आस पराई
क्या तन मांजता रे एक दिन माटी में मिल जाना

माटी ओढ़ना, माटी बिछौना माटी का सिरहाना
कहे कबीर सुन ले रे बन्दे ये जग आना जाना
क्या तन मांजता रे एक दिन माटी में मिल जाना
पवन चले उड़ जाना रे पगले…हो
पवन चले उड़ जाना रे पगले समय चूक पछताना
समय चूक पछताना
क्या तन मांजता रे एक दिन माटी में मिल जाना

Kabir das ke dohe – कबीर दास के दोहे

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय॥

पतिबरता मैली भली गले कांच की पोत ।
सब सखियाँ में यों दिपै ज्यों सूरज की जोत ॥ 

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय॥

देह धरे का दंड है सब काहू को होय । 
ज्ञानी भुगते ज्ञान से अज्ञानी भुगते रोय॥

हाड जले लकड़ी जले जले जलावन हार । 
कौतिकहारा भी जले कासों करूं पुकार ॥

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर॥

संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत 
चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत॥

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ॥

जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं। 
जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं॥

तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई।
सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ॥

माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर। 
आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर ॥

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय । 
हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय ॥

झिरमिर- झिरमिर बरसिया, पाहन ऊपर मेंह। 
माटी गलि सैजल भई, पांहन बोही तेह॥

कहत सुनत सब दिन गए, उरझी न सुरझ्या मन। 
कहि कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन॥

इक दिन ऐसा होइगा, सब सूं पड़े बिछोह। 
राजा राणा छत्रपति, सावधान किन होय॥

जाता है सो जाण दे, तेरी दसा न जाइ। 
खेवटिया की नांव ज्यूं, घने मिलेंगे आइ॥

कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आई । 
अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराई ॥

जैसा की हमने प्रारम्भ में ही कहा की एक ही लेख में kabir das biography in Hindi लिखना संभव नहीं है। फिर भी एक प्रयास किया है। पर kabir das जी की Biography Hindi में लिखते हुए लगा की हमें और लेख उनपर लिखना चाहिए। तो हम कबीर दास जी पर जल्द से जल्द और लेख के साथ जरूर उपस्थित होंगे। अगर आपको इस विषय पर अपना कोई सुझाव देना है या कुछ भी पूछना चाहें तो comment के माध्यम से अवश्य पूछ सकते हैं।

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