Suheldev Pasi Biography in Hindi – Battle of Bahraich

Biography of Suheldev Pasi Battle of Bahraich

Suheldev Pasi Biography in Hindi – Battle of Battle of Bahraich: हमने भारत के इतिहास में बहुत से महान राजाओं और उनके द्वारा राष्ट्ररक्षा के लिए लड़े गए विध्वंसकारी युद्धों के बारे में पढ़ा होगा पर भारत का इतिहास इतना पुराना और विराट है कि आज की पीढ़ी अभी भी कई महान राजाओं उनके द्वारा लड़े गए युद्धों उनके त्याग और तपस्या की कहानी से अनिभिज्ञ है। लेकिन इसका एक कारण और भी है, और वो है कि जब भारत परतंत्र था तो उस वक्त उसके गौरवशाली इतिहास को एक षड्यंत्र के तहत नष्ट करने का उसमें मिलावट करने का प्रयास हुआ और ये षड्यंत्र देश के स्वतंत्र होने के बाद भी जारी रहा और इसका श्रेय जाता है भारत के वामपंथी इतिहासकारों को। इसी षड्यंत्र के तहत इतिहास के पन्नों में कहीं दबा रह गया राजा सुहेलदेव पासी का इतिहास और उनके द्वारा लड़ा गया एक ऐसा युद्ध जो Battle of Bahraich के नाम से जाना जाता है। आज हम जानेंगे Suheldev Pasi Biography in Hindi और Battle of Bahraich के विषय में।

Suheldev Pasi Biography in Hindi – Battle of Bahraich

महाराजा सुहेलदेव पासी के विषय में जितनी भी जानकारी उपलब्ध है, हम प्रयास करेंगे की वो सब हम अपने इस लेख के माध्यम से आप तक पहुँचा पायें। राजा सुहेलदेव के विषय में सबसे पहला और विश्वसनीय लिखित इतिहास ‘मिरात-इ-मसूदी’ में मिलता है। 17वीं सदी में मुगल राजा जहांगीर के दौर में अब्दुर रहमान चिश्ती नाम के एक लेखक हुए थे जिन्होंने 1620 के दशक में फारसी भाषा में एक दस्तावेज लिखा ‘मिरात-इ-मसूदी’ जिसका अर्थ होता है ‘मसूद का आइना’। इस दस्तावेज को गाज़ी सैयद सालार मसूद की बायोग्राफी बताया जाता है। इसके अलावा राजा सुहेलदेव के विषय में उनकी जाति के लोग और उस इलाके के लोग जहां उन्होंने शासन किया,सदियों से एक दूसरे को बताते आये हैं जिसको लिखित इतिहास में तो दर्ज नहीं किया गया पर इसकी मान्यता को यूँ ही नहीं नाकारा जा सकता क्यूंकि उसको लिखा नहीं गया है।

Suheldev Pasi
source: wikipidea

राजा सुहेलदेव पासी के विषय में सन 1940 में स्कूल टीचर रहे गुरु सहाय दीक्षित द्विदीन ने कविता लिखी जिसका नाम है ‘श्री सुहेल बवानी’ , जिसमें उन्होंने राजा सुहेलदेव पासी को को एक जैन राजा के रूप में प्रस्तुत किया है। वहीँ अंग्रेज़ उनको राजपूत राजा मानते थे जिन्होंने 21 राजाओं का एक संगठन बना कर बहराइच के इलाके में शासन किया था। उनको कई क्षत्रिय संगठन नागवंशी राजपूत मानते हैं। कुल मिला कर उनकी जाति को लेकर इतना द्वन्द इसलिए है क्यूंकि आज की जातिगत व्यवस्था और उस वक्त की व्यवस्था में बहुत भेद है और इतनी सदियाँ बीत जाने के बाद कई नयी जातियों का निर्माण हुआ तो कई का विभाजन। किन्तु जो सबसे लोकप्रिय और स्वीकृत मान्यता यही है कि राजा सुहेलदेव पासी समाज से आते थे।

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ऐतिहासिक सूत्रों की मानें तो बहराइच राज्य की स्थापना श्रावस्ती नरेश राजा प्रसेनजीत ने की थी, जिसका प्रारंभिक नाम भरवाइच था। राजा प्रसेनजीत को बहराइच नरेश के नाम से भी संबोधित किया जाता था। इन्हीं महाराजा प्रसेनजित को माघ माह की बसंत पंचमी के दिन 990 ई. को एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम सुहेलदेव रखा गया। अवध गजेटीयर के अनुसार महाराजा सुहेलदेव का शासन काल 1027 ई. से 1077 तक स्वीकार किया गया है। पासी जाति के महाराजा सुहेलदेव का साम्राज्य पूर्व में गोरखपुर तथा पश्चिम में सीतापुर तक फैला हुआ था। गोंडा बहराइच, लखनऊ, बाराबंकी, उन्नाव व लखीमपुर इस राज्य की सीमा के अंतर्गत समाहित थे। राजा सुहेलदेव ने 21 पासी राजाओं का एक संघ बनाया था जिनके साथ मिलकर वो इस पूरे क्षेत्र में राज करते थे। कहा जाता है कि महाराजा सुहेलदेव बालक ऋषि के अनुयायी थे, जिनका आश्रम बहराइच में स्थित है।

Battle of Bahraich – बहराइच का युद्ध

अब बात करते हैं उस विध्वंसकारी युद्ध की जिसे इतिहास में Battle of Bahraich के नाम से जाना जाता है। यह वो युद्ध जिसने महान राजा सुहेलदेव पासी को इतिहास के पन्नों में अमर कर दिया। हमने प्रारम्भ में जिस ‘मिरात-इ-मसूदी’ का जिक्र किया था उसके रचियता अब्दुर रहमान चिश्ती ने इसे गाज़ी सैयद सालार मसूद की बायोग्राफी के रूप में लिखा था। और इसी में सबसे पहले Battle of Bahraich का उल्लेख मिलता है। मिरात-इ-मसूदी के मुताबिक मसूद महमूद गजनवी का भांजा था, जो 16 की उम्र में अपने पिता गाज़ी सैयद सालार साहू के साथ भारत पर हमला करने आया था। अपने पिता के साथ उसने इंडस नदी पार करके मुल्तान, दिल्ली, मेरठ और सतरिख (बाराबंकी) तक जीत दर्ज की। कहते हैं की इससे पहले सालार मसूद अपने मामा महमूद गज़नी के साथ 1026 CE में आया था और वो उस वक्त हुई सोमनाथ मंदिर की लूट में भी शामिल था।

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सालार मसूद का पहला सैन्य संघर्ष दिल्ली के राजा महिपाल तोमर के साथ हुआ था, इस युद्ध को वो जीत न पाटा अगर समय से ग़ज़नी से सेना न पहुँची होती। यहाँ से वो मेरठ की ओर बड़ चला, जिसके शासक राजा हरि दत्त ने आत्मसमर्पण कर दिया और इस्लाम स्वीकार कर लिया। यहां से मसूद ने बुलंदशहर और बदायूं के रास्ते कन्नौज तक चढ़ाई की। कन्नौज ने अवध और पूर्वांचल में आगे के इस्लामिक विजय के लिए कन्नौज को एक सैन्य अड्डे के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति देने के साथ-साथ मसूद को बड़ी मात्रा में धन सम्पदा सौंपी। और यही वो समय है जब श्रावस्ती में महाराज सुहेलदेव का शासन था।

युद्धों को लड़ता और जीतता हुआ सालार मसूद मेरठ, कन्नौज, मलिहाबाद से होता हुआ सतरिख पहुँचा जो की बहराइच का एक शहर था। सतरिख हिन्दुओं के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण जगह है क्यूंकि इसी जगह पर महर्षि वशिष्ठ ने भगवान् श्री राम और लक्ष्मण को शिक्षा दी थी। सतरिख में मसूद को न जाने क्या भाया कि उसने यहाँ टिकने का फैसला किया। टिकने के लिए उसे आसपास के हिंदू राजाओं से सुरक्षा भी चाहिए थी, तो उसने अपने साथियों को आसपास के राजाओं को पराजित करने के लिए भेजा। इनमें से एक खेमे का खुद मसूद का पिता सालार साहू नेतृत्व कर रहा था। बहराइच और उसके आसपास के इलाकों के राजाओं ने मसूद के साथियों से युद्ध किया, लेकिन वो सालार साहू से हार गए। वो अलग बात है कि हार के बावजूद वो झुकने को तैयार नहीं थे।

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मिया रजब और सालार सैफुद्दीन बहराइच की तरफ गए, अमीर हसन अरब महोना के लिए, मलिक फजल वाराणसी, सायद साहू ने कर्रा और मानिकपुर लिया। हरदोई के खिलाफ सैयद अज़ीज़-उद-दीन को भेजा गया था, लेकिन गोपामऊ में लड़ाई में हार गया। सतरीख में रहते हुए, मसूद को रेवाड़ी के पास धुंदगढ़ के किले से दोस्त मोहम्मद के संकट में होने की सूचना मिली। मसूद को न चाहते हुए भी अपने धार्मिक शिक्षक, सय्यद इब्राहिम मशहदी बराह हजारी को घेराबंदी से राहत देने के लिए भेजना पड़ा। सईद इब्राहिम मशहदी बरह हजारी जिस भी मार्ग निकलता, ‘मिरात-इ-मसूदी’ के अनुसार, कोई भी गैर-मुस्लिम उसकी तलवार से बच नहीं सकता था, जब तक कि वह इस्लाम में परिवर्तित नहीं हो जाता। लेकिन वह कई अन्य कमांडरों के साथ धुंदगढ़ की लड़ाई में मारा गया। उसका मकबरा रेवाड़ी के पास अलवर जिले के शहर तिजारा से 20 किमी दूर कोट कासिम में स्थित है।

इसी बीच बहराइच में सलार सैफुद्दीन को घेर लिया गया था और सालार मसूद को अयोध्या की ओर अपना मार्च रोकना पड़ा था, जो अब शहर के पास साकेत के बाहरी इलाके में सलारपुर के नाम से जाना जाता है। बाध्य हो कर सालार मसूद को उत्तर की तरफ मुड़ना पड़ा ताकि सालार सैफुद्दीन की सेना को अतिरिक्त सेना उपलब्ध कराई जा सके। बहराइच के सभी सरदार राप्ती नदी की सहायक नदी भकला नदी के पास इकट्ठे हो गए थे। अंतिम युद्ध का मैदान सज चूका था।

सालार मसूद के सेनापति मीर नसरुल्लाह की मौत के साथ ही इस्लामिक सेना का दाहिना विंग ध्वस्त हो गया। मीर नसरुल्लाह का मकबरा बहराइच से 12 किमी उत्तर में डिकोली खुर्द गाँव में स्थित है। जल्द ही सालार मइया रज्जब की हत्या कर दी गई। वह सालार मसूद का करीबी रिश्तेदार था जो की स्वभाव से बहुत अड़ियल था। उसका मकबरा बहराइच से 3 किमी पूर्व में शाहपुर जोत यूसुफ गाँव में स्थित है और उसे वहाँ ‘हाथिला पीर’ के नाम से जाना जाता है। 10 जून, 1034 को महाराजा सुहेलदेव पासी के नेतृत्व में हिंदू सेना ने सालार मसूद गाजी की फौज पर तूफानी गति से आक्रमण किया। इस युद्ध में सालार मसूद अपनी धोड़ी पर सवार होकर बड़ी वीरता के साथ लड़ा लेकिन अधिक देर तक ठहर न सका। राजा सुहेलदेव ने शीध्र ही उसे अपने बाण का निशाना बना लिया और उनके धनुष द्वारा छोड़ा गया एक विष बुझा बाण सालार मसूद के गले में आ लगा जिससे उसका प्राणांत हो गया। राजा सुहेलदेव के गुरु ऋषि बालक के आश्रम के पवित्र सूर्यकुंड के पास एक महुआ के पेड़ के नीचे उनकी मृत्यु हो गई। इसके दूसरे ही दिन शिविर की देखभाल करने वाला सालार इब्राहीम भी बचे हुए सैनिको के साथ मारा गया।

सैयद सालार मसूद गाजी को उसकी डेढ़ लाख की इस्लामिक सेना के साथ समाप्त करने के बाद महाराजा सुहेल देव पासी ने विजय पर्व मनाया और इस महान विजय के उपलक्ष्य में कई पोखरे भी खुदवाए। और इस तरह से आततायी सालार मसूद और उसके भारत में आतंक के द्वारा इस्लाम के प्रचार के इरादे का अंत हुआ।

तो ये है Suheldev Pasi Biography in Hindi और Battle of Bahraich. मैंने पूरा प्रयास किया कि जितनी भी जानकारी महाराजा सुहेलदेव और Battle of Bahraich के विषय में उपलब्ध है वो आपतक पहुँचा सकूँ। लेकिन मित्रों अंत में एक विचार आपसे साँझा करना चाहूँगा, जब मैं महँ योद्धा महाराजा सुहेलदेव के विषय में जानकारी इकट्ठी कर रहा था तो बहुत मुश्किल से उनके बारे में ऐतिहासिक जानकारी मिल पायी पर जानकार बड़ी हैरानी और दुःख हुआ कि उन्होंने जिस आततायी को मार कर भारत को उसके अत्याचारों और बलपूर्वक हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन से रोका उस सालार मसूद को भारत का सम्प्रदाय भगवान के जैसा पूजता है और वो हिन्दू राजा जिसने भारत को उसके आतंक और अत्याचारों से मुक्ति दिलाई उसका इतिहास और उसकी सच्चाई हमें ढूँढ़नी पड़ रही है।

हैरानी होती है देख कर की जिस आतंकी सालार मसूद ने सैकड़ों हिन्दुओं की हत्या की, सैकड़ों गौ वंश की हत्या की, जिसने बलपूर्वक धर्म परिवर्तन कराये उस सालार मसूद की मजार पर न सिर्फ भारत के मुस्लमान अपितु हिन्दू भी भीख माँगने जाते हैं। और तो और जब उस मजार पर उर्स लगता है उस वक्त इस्लामिक वक्ता चीख चीख कर सालार मसूद की महिमा गाते हैं और हिन्दू राजा सुहेलदेव को कोसते हैं, अपशब्द कहते हैं। क्या हम कल्पना भी कर सकते हैं की इजराइल में यहूदी नाजीवादी हिटलर की मजार बना कर प्रार्थना करने और भीख माँगने जाएँ। सम्प्रदायनिरपेक्षता का अर्थ अपने इतिहास और अपने इतिहास के योद्धाओं का अपमान नहीं होता पर देखने में आरहा है कि एक सम्प्रदाय को प्रसन्न करने के लिए हम अपने गौरवशाली इतिहास, महान योद्धाओं, अपने पूज्यों और संस्कृति का लगातार अपमान कर रहे हैं। भारत के उठने और जागने का वक्त आगया है अन्यथा आज तो हम सिर्फ अपना इतिहास ढूँढ रहे हैं नहीं जागे तो भविष्य और अस्तित्व दोनों खो देंगे।

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